ममता अपनी
लुटाती वो विश्वास दे
दुनिया रूठे
मगर फिर भी माँ साथ दे
हर कदम
हर डगर
वो ये एहसास दे
दुनिया रूठे
मगर फिर भी माँ साथ दे ।
माँ का दर्ज़ा
है ऊँचा उस भगवान् से
जिसकी पूजा
करे सब ये मानकर
की यशोदा का कान्हा
कौशल्या का राम
करे उनकी रक्षा
सदा सुबह - शाम ।
वो गंगा - सी
निर्मल
है निश्छल धरा - सी
वो ममता की
मूरत
लगे देवी माँ सी
है आँचल में
उसके
ज़माने की खुशियाँ
बिना माँ के
लगती अधूरी ये दुनिया ।
बेटी बनकर
सजाया था बाबुल का घर
और पिया संग
निभाए थे सातो वचन
कर्ज़ उसका
उतरेगा कैसे जहाँ
खुद को करके फ़ना
वो कहलायी माँ ।
Tuesday, March 27, 2007
बचपन
राहे छोटी
वो पतली - सी पगडन्डियाँ
और बचपन की
मेरी वो हमजोलियाँ
सबको रंग में
भिगोती थी पिचकारियाँ
भूलूं कैसे ?
मैं छोटी सी वो टोलियां
और मासूम
चेहरों की वो बालियां
रोज़ बनती
बिगड़ती थी जो यारियां
भूलूं कैसे ?
मैं मिटटी की वो गाडियां ।
जलती - बुझती
दिवाली की वो बत्तियाँ
और दीपो से
सजती थी जो वेदियां
फूल पूजा के
रखे हुई थालियाँ
भूलूं कैसे ?
मैं प्यारी सी वो राखियाँ ?
वो हमजोलियाँ
प्यारी अठखेलियाँ
और बचपन
की मेरी वो नादानियाँ
साथ हरदम किसी का
वो अंगड़ाइयाँ
भूलूं कैसे ?
मैं उसकी वो परछाइयाँ ?
उसके कानो को
छूती वो दो बालियाँ
और आंखों में
छायी हुई शोखियां
हंसके मुझको
मनाने की वो युक्तियाँ
मैं हूँ भुला नही
उसकी ये खूबियां ।
मन में उठती तड़प
जब हों तनहाइयां
याद आती
है बजती
वो शहनाइयाँ
वो हँसना, वो रोना
वो दुःख बाँटना
मैं हूँ भुला नही
उसकी परछाइयाँ ।
मेरा बचपन
मुझे फिर बुलाने लगा
जैसे आवाज़
देती थी खिड़की से माँ
मैं मुसाफिर
हर एक रोज़ बनता गया
छोड़ आया बहुत दूर
वो वादियाँ ।
रोज़ उड़ती
पतंगों की वो डोरियां
छूट कैसे गयी
बढ़ गयी दूरियां
मेरा बचपन
मुझे छोड़ ऐसे गया
जैसे बाबुल के
घर से गयी डोलियाँ ।
वो पतली - सी पगडन्डियाँ
और बचपन की
मेरी वो हमजोलियाँ
सबको रंग में
भिगोती थी पिचकारियाँ
भूलूं कैसे ?
मैं छोटी सी वो टोलियां
और मासूम
चेहरों की वो बालियां
रोज़ बनती
बिगड़ती थी जो यारियां
भूलूं कैसे ?
मैं मिटटी की वो गाडियां ।
जलती - बुझती
दिवाली की वो बत्तियाँ
और दीपो से
सजती थी जो वेदियां
फूल पूजा के
रखे हुई थालियाँ
भूलूं कैसे ?
मैं प्यारी सी वो राखियाँ ?
वो हमजोलियाँ
प्यारी अठखेलियाँ
और बचपन
की मेरी वो नादानियाँ
साथ हरदम किसी का
वो अंगड़ाइयाँ
भूलूं कैसे ?
मैं उसकी वो परछाइयाँ ?
उसके कानो को
छूती वो दो बालियाँ
और आंखों में
छायी हुई शोखियां
हंसके मुझको
मनाने की वो युक्तियाँ
मैं हूँ भुला नही
उसकी ये खूबियां ।
मन में उठती तड़प
जब हों तनहाइयां
याद आती
है बजती
वो शहनाइयाँ
वो हँसना, वो रोना
वो दुःख बाँटना
मैं हूँ भुला नही
उसकी परछाइयाँ ।
मेरा बचपन
मुझे फिर बुलाने लगा
जैसे आवाज़
देती थी खिड़की से माँ
मैं मुसाफिर
हर एक रोज़ बनता गया
छोड़ आया बहुत दूर
वो वादियाँ ।
रोज़ उड़ती
पतंगों की वो डोरियां
छूट कैसे गयी
बढ़ गयी दूरियां
मेरा बचपन
मुझे छोड़ ऐसे गया
जैसे बाबुल के
घर से गयी डोलियाँ ।
श्रद्धांजलि
तुने तो
गरिमामय बनकर
दे दी
खुद को
मुक्तान्जलि
मैं
गंगा के तट पर बैठा
दे रहा
तुझे श्रद्धांजलि ।
अर्थहीन पुष्पों की कैसे
दूँ तुझको पुष्पांजलि ?
समझ
नही आता कि कैसे
दूँ तुझको श्रद्धांजलि ?
तेरी
करुणा के आगे
मद्धिम
मेरी करुणान्जली
तेरे
पावन चरणों में
अर्पित
मेरी दिव्यान्जली ।
राखी का हर एक बन्धन
दे रह
तुझे प्रेमान्जली
निश्छल
भावो से परिपूरित
ये मेरी भावान्जली ।
नीर भरे
नयनों से अलंकृत
तुझे
मेरी अश्रुंजली
श्रध्दा के
सुमनों से सुसज्जित
तुझे
मेरी श्रद्धांजलि ।
क्या
मधुशाला ही कष्टों से
दिला
सके मुक्तान्जली
पर
ऐसे तो अपमानित
होगी
मेरी श्रद्धांजलि ।
सदैव
धर्म का पालन कर
अधर्म
को दूंगा तिलांजलि
सच्चे मन से
तुझे समर्पित
ये
मेरी श्रद्धांजलि ।
पावन शब्दो को
कर अर्जित
बना रहा
काव्यांजली
गंगा में
कर दीप विसर्जित
बहा रहा
दीपान्जली ।
अपने
गीतो में रचकर
दूंगा
तुझको गीतांजलि
नतमस्तक
हों तुझे समर्पित
ये
मेरी कवितान्जली ।
कभी नही
सोचा था ऐसे
दूंगा
मैं श्रद्धांजलि
अश्रुओ
कि धार देता हूँ
मैं
भर - भर अंजलि ।
गरिमामय बनकर
दे दी
खुद को
मुक्तान्जलि
मैं
गंगा के तट पर बैठा
दे रहा
तुझे श्रद्धांजलि ।
अर्थहीन पुष्पों की कैसे
दूँ तुझको पुष्पांजलि ?
समझ
नही आता कि कैसे
दूँ तुझको श्रद्धांजलि ?
तेरी
करुणा के आगे
मद्धिम
मेरी करुणान्जली
तेरे
पावन चरणों में
अर्पित
मेरी दिव्यान्जली ।
राखी का हर एक बन्धन
दे रह
तुझे प्रेमान्जली
निश्छल
भावो से परिपूरित
ये मेरी भावान्जली ।
नीर भरे
नयनों से अलंकृत
तुझे
मेरी अश्रुंजली
श्रध्दा के
सुमनों से सुसज्जित
तुझे
मेरी श्रद्धांजलि ।
क्या
मधुशाला ही कष्टों से
दिला
सके मुक्तान्जली
पर
ऐसे तो अपमानित
होगी
मेरी श्रद्धांजलि ।
सदैव
धर्म का पालन कर
अधर्म
को दूंगा तिलांजलि
सच्चे मन से
तुझे समर्पित
ये
मेरी श्रद्धांजलि ।
पावन शब्दो को
कर अर्जित
बना रहा
काव्यांजली
गंगा में
कर दीप विसर्जित
बहा रहा
दीपान्जली ।
अपने
गीतो में रचकर
दूंगा
तुझको गीतांजलि
नतमस्तक
हों तुझे समर्पित
ये
मेरी कवितान्जली ।
कभी नही
सोचा था ऐसे
दूंगा
मैं श्रद्धांजलि
अश्रुओ
कि धार देता हूँ
मैं
भर - भर अंजलि ।
किसलिये
अर्थ की
किस चाह से
संवेदना
की भीड़ में
खुद को
ढून्ढ्ता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
जीर्ण - शीर्ण
राह पर
तिमिर से
खुद घिरा हुआ
प्रकाश
खोजता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
धर्म के
इतिहास पर
असत्य के
हर मंच पर
सत्य
बोलता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
देश के
उत्थान में
पतन की
हर एक राह को
नित्य
त्यागता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
दर्द की
अभिव्यक्ति को
कलम से
मै निकालता
और
पंक्तियों में डालता हूँ
किसलिये - किसलिये ?
अश्रुओं की धार में
क्यों कंटकों की सेज पर ?
स्नेह
ढून्ढ्ता हूँ मै
किसलिये - किसलिये ?
स्वार्थ के
किस लोभ से ?
किस
व्यथा की टीस से ?
तुझको
पूजता हूँ मै
किसलिये - किसलिये ?
दुःख - दर्द
अपना भूलकर
सुख को
सहेली मानकर
मैं चैन तेरा
खोजता हूँ
किसलिये - किसलिये ?
किस चाह से
संवेदना
की भीड़ में
खुद को
ढून्ढ्ता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
जीर्ण - शीर्ण
राह पर
तिमिर से
खुद घिरा हुआ
प्रकाश
खोजता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
धर्म के
इतिहास पर
असत्य के
हर मंच पर
सत्य
बोलता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
देश के
उत्थान में
पतन की
हर एक राह को
नित्य
त्यागता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?
दर्द की
अभिव्यक्ति को
कलम से
मै निकालता
और
पंक्तियों में डालता हूँ
किसलिये - किसलिये ?
अश्रुओं की धार में
क्यों कंटकों की सेज पर ?
स्नेह
ढून्ढ्ता हूँ मै
किसलिये - किसलिये ?
स्वार्थ के
किस लोभ से ?
किस
व्यथा की टीस से ?
तुझको
पूजता हूँ मै
किसलिये - किसलिये ?
दुःख - दर्द
अपना भूलकर
सुख को
सहेली मानकर
मैं चैन तेरा
खोजता हूँ
किसलिये - किसलिये ?
पीड़ा
मेरे
व्यथित ह्रदय में
सागर की
उच्च हिलोरें
करुणा
लेती अंगडाई
पहुंची
नयनों से मिलने ।
दिन बैरी
मधुर मिलन का
रात आयी
ले स्वप्न सलोने
मिलकर
अतीत की यादे
पहुंची
नयनों में बसने ।
नयनों की
स्वीकृति पाकर
स्मृति ने
किया बसेरा
भर आयीं
निष्ठुर आंखें
पल भर में
जाने कैसे ?
आंखों का
खारा पनि
आता
पलकों से लड़कर
चुम्बन
करता गालो पर
गिरता
बंकर दो झरने ।
होंठों पर
आयी पीड़ा
पी जाती
मर्म कहानी
अंतस की
प्यास बुझाकर
मुंद जाती
प्यासी आंखें ।
आंखों की
सारी पीड़ा
बह जाती
बनकर पानी
रह जति
सूनी आंखें
मरुस्थल की
एक कहानी ।
मैं जागा
जब निद्रा से
सूखी थी
मेरी आंखें
थी अलसाई - सी
पलकें,
विस्मृत
थी सारी बातें ।
था खड़ा
दिवस दिनकर संग
फैलाये
अपनी बाहें
अभिनन्दन
करती किरणें
बैठी थी
बनकर राहें ।
व्यथित ह्रदय में
सागर की
उच्च हिलोरें
करुणा
लेती अंगडाई
पहुंची
नयनों से मिलने ।
दिन बैरी
मधुर मिलन का
रात आयी
ले स्वप्न सलोने
मिलकर
अतीत की यादे
पहुंची
नयनों में बसने ।
नयनों की
स्वीकृति पाकर
स्मृति ने
किया बसेरा
भर आयीं
निष्ठुर आंखें
पल भर में
जाने कैसे ?
आंखों का
खारा पनि
आता
पलकों से लड़कर
चुम्बन
करता गालो पर
गिरता
बंकर दो झरने ।
होंठों पर
आयी पीड़ा
पी जाती
मर्म कहानी
अंतस की
प्यास बुझाकर
मुंद जाती
प्यासी आंखें ।
आंखों की
सारी पीड़ा
बह जाती
बनकर पानी
रह जति
सूनी आंखें
मरुस्थल की
एक कहानी ।
मैं जागा
जब निद्रा से
सूखी थी
मेरी आंखें
थी अलसाई - सी
पलकें,
विस्मृत
थी सारी बातें ।
था खड़ा
दिवस दिनकर संग
फैलाये
अपनी बाहें
अभिनन्दन
करती किरणें
बैठी थी
बनकर राहें ।
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