Tuesday, March 27, 2007

माँ

ममता अपनी
लुटाती वो विश्वास दे
दुनिया रूठे
मगर फिर भी माँ साथ दे
हर कदम
हर डगर
वो ये एहसास दे
दुनिया रूठे
मगर फिर भी माँ साथ दे ।

माँ का दर्ज़ा
है ऊँचा उस भगवान् से
जिसकी पूजा

करे सब ये मानकर
की यशोदा का कान्हा
कौशल्या का राम
करे उनकी रक्षा
सदा सुबह - शाम ।

वो गंगा - सी
निर्मल
है निश्छल धरा - सी
वो ममता की
मूरत
लगे देवी माँ सी
है आँचल में
उसके
ज़माने की खुशियाँ
बिना माँ के
लगती अधूरी ये दुनिया ।

बेटी बनकर
सजाया था बाबुल का घर

और पिया संग
निभाए थे सातो वचन
कर्ज़ उसका

उतरेगा कैसे जहाँ
खुद को करके फ़ना
वो कहलायी माँ ।


बचपन

राहे छोटी
वो पतली - सी पगडन्डियाँ
और बचपन की

मेरी वो हमजोलियाँ
सबको रंग में

भिगोती थी पिचकारियाँ
भूलूं कैसे ?
मैं छोटी सी वो टोलियां
और मासूम
चेहरों की वो बालियां
रोज़ बनती
बिगड़ती थी जो यारियां
भूलूं कैसे ?
मैं मिटटी की वो गाडियां ।

जलती - बुझती
दिवाली की वो बत्तियाँ
और दीपो से

सजती थी जो वेदियां
फूल पूजा के

रखे हुई थालियाँ
भूलूं कैसे ?
मैं प्यारी सी वो राखियाँ ?

वो हमजोलियाँ
प्यारी अठखेलियाँ
और बचपन
की मेरी वो नादानियाँ
साथ हरदम किसी का
वो अंगड़ाइयाँ
भूलूं कैसे ?

मैं उसकी वो परछाइयाँ ?

उसके कानो को
छूती वो दो बालियाँ
और आंखों में
छायी हुई शोखियां
हंसके मुझको
मनाने की वो युक्तियाँ
मैं हूँ भुला नही
उसकी ये खूबियां ।

मन में उठती तड़प
जब हों तनहाइयां
याद आती

है बजती
वो शहनाइयाँ
वो हँसना, वो रोना
वो दुःख बाँटना
मैं हूँ भुला नही
उसकी परछाइयाँ ।

मेरा बचपन
मुझे फिर बुलाने लगा
जैसे आवाज़
देती थी खिड़की से माँ
मैं मुसाफिर

हर एक रोज़ बनता गया
छोड़ आया बहुत दूर
वो वादियाँ ।

रोज़ उड़ती
पतंगों की वो डोरियां
छूट कैसे गयी
बढ़ गयी दूरियां
मेरा बचपन
मुझे छोड़ ऐसे गया
जैसे बाबुल के
घर से गयी डोलियाँ ।



श्रद्धांजलि

तुने तो
गरिमामय बनकर
दे दी

खुद को
मुक्तान्जलि
मैं

गंगा के तट पर बैठा
दे रहा
तुझे श्रद्धांजलि ।


अर्थहीन पुष्पों की कैसे
दूँ तुझको पुष्पांजलि ?
समझ
नही आता कि कैसे
दूँ तुझको श्रद्धांजलि ?

तेरी
करुणा के आगे
मद्धिम
मेरी करुणान्जली
तेरे

पावन चरणों में
अर्पित
मेरी दिव्यान्जली ।

राखी का हर एक बन्धन
दे रह
तुझे प्रेमान्जली
निश्छल

भावो से परिपूरित
ये मेरी भावान्जली ।

नीर भरे
नयनों से अलंकृत
तुझे
मेरी अश्रुंजली
श्रध्दा के
सुमनों से सुसज्जित
तुझे
मेरी श्रद्धांजलि ।

क्या
मधुशाला ही कष्टों से
दिला
सके मुक्तान्जली
पर
ऐसे तो अपमानित
होगी
मेरी श्रद्धांजलि ।

सदैव
धर्म का पालन कर
अधर्म
को दूंगा तिलांजलि
सच्चे मन से
तुझे समर्पित
ये
मेरी श्रद्धांजलि ।

पावन शब्दो को
कर अर्जित
बना रहा
काव्यांजली
गंगा में
कर दीप विसर्जित
बहा रहा
दीपान्जली ।

अपने
गीतो में रचकर
दूंगा
तुझको गीतांजलि
नतमस्तक
हों तुझे समर्पित
ये
मेरी कवितान्जली ।

कभी नही
सोचा था ऐसे
दूंगा
मैं श्रद्धांजलि
अश्रुओ
कि धार देता हूँ

मैं
भर - भर अंजलि ।

किसलिये

अर्थ की
किस चाह से
संवेदना
की भीड़ में
खुद को
ढून्ढ्ता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?

जीर्ण - शीर्ण
राह पर
तिमिर से
खुद घिरा हुआ
प्रकाश
खोजता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?


धर्म के
इतिहास पर
असत्य के
हर मंच पर
सत्य
बोलता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?

देश के
उत्थान में
पतन की
हर एक राह को
नित्य
त्यागता हूँ मैं
किसलिये - किसलिये ?


दर्द की
अभिव्यक्ति को
कलम से
मै निकालता
और
पंक्तियों में डालता हूँ
किसलिये - किसलिये ?

अश्रुओं की धार में
क्यों कंटकों की सेज पर ?
स्नेह
ढून्ढ्ता हूँ मै
किसलिये - किसलिये ?

स्वार्थ के
किस लोभ से ?
किस
व्यथा की टीस से ?
तुझको
पूजता हूँ मै
किसलिये - किसलिये ?

दुःख - दर्द
अपना भूलकर
सुख को
सहेली मानकर
मैं चैन तेरा
खोजता हूँ
किसलिये - किसलिये ?

पीड़ा

मेरे
व्यथित ह्रदय में
सागर की
उच्च हिलोरें
करुणा
लेती अंगडाई
पहुंची

नयनों से मिलने ।

दिन बैरी
मधुर मिलन का
रात आयी
ले स्वप्न सलोने
मिलकर
अतीत की यादे
पहुंची
नयनों में बसने ।

नयनों की
स्वीकृति पाकर
स्मृति ने
किया बसेरा
भर आयीं
निष्ठुर आंखें
पल भर में

जाने कैसे ?

आंखों का
खारा पनि
आता
पलकों से लड़कर
चुम्बन
करता गालो पर
गिरता
बंकर दो झरने ।

होंठों पर
आयी पीड़ा
पी जाती
मर्म कहानी

अंतस की
प्यास बुझाकर
मुंद जाती
प्यासी आंखें ।


आंखों की
सारी पीड़ा

बह जाती
बनकर पानी
रह जति
सूनी आंखें
मरुस्थल की
एक कहानी ।

मैं जागा
जब निद्रा से
सूखी थी
मेरी आंखें
थी अलसाई - सी
पलकें,

विस्मृत
थी सारी बातें ।

था खड़ा
दिवस दिनकर संग
फैलाये
अपनी बाहें
अभिनन्दन
करती किरणें
बैठी थी
बनकर राहें ।

Sunday, March 25, 2007

जीवन ! तू क्या है ?

उन्मुक्तता है
या है बन्धन,
है सहजता

या है क्रन्दन
जीवन !
तू क्या है ?

प्रतिक्षण
क्षरण है या
की निर्माण प्रतिक्षण,
प्रतिक्षण
पतन है
या कि उत्थान प्रतिक्षण ।

विश्वास है
बंधता हुआ
या टूटता हुआ
विश्वास है तू
है सजल

नयनों कि भाषा
या चमकती
आस है तू ।

है समर
घनघोर या
तू शान्त है
विश्राम कोई
खिलखिलाती सी
लहर है
या कोई
है मौन सरिता
जीवन !
तू क्या हैं ?

प्रात है
उत्कर्ष का
या डूबती
संध्या है कोई
सार है
दुःख - दर्द का
या सुख की
परिभाषा है कोई ?


तू मिलान
संगीत है
या है विरह
का गीत कोई
तू जन्म का
भ्रम है कोई
या है
मृत्यु का अटल सच
जीवन !
तू क्या है ?

कहीं वो खुदा तो नही !

तलाश जारी है
अभी तक
उसकी
जो मुझे मिल ही नही
देखा भी नही
है उसे
छुआ तक नही
बस ख्वाबो के
दरवाज़े पर ही
दस्तक
दी है उसने
हर बार
मगर
बैचेन हूँ मैं
उसे पाने को
जिसे मई
जानता तक नही
एहसास है
वो मेरे ज़हन में
दबा हुआ
जिसे मैं
अपने भीतर
महसूस करता हूँ ।

मगर वो
मेरे सामने क्यों नही आता
मैं
पूछना चाहता हूँ उससे
उसका नाम,
वल्दियत
और रिहाइश ।

लोग
तरह तरह से
पुकारते है उसको
शायद
बदनाम करते हैं
मगर
कोई नही
जो मुझे बता सके
कि किसने
उसे देखा है
बात की है उससे
उसे
महसूस किया है
अपने भीतर ।

बस
उसके नाम पर
हाथों में पत्थर लिए
एक - दुसरे का
सिर फोड़ते है
बेबसों
बेकसूरों के खून से
संगीनें रंग्तें हैं
और फिर
यह भी कहते है
कि सबको
उसी ने बनाया है ।

कौन है वो
जो अपने बच्चो को
अपने ही
कई रूपों का
दीवाना बनाकर
आपस में
लड़्वा रह है
कौन है वो
जो मंदिर - मस्जिद
चर्च - गुरूद्वारे
सभी जगह
एक साथ रह रहा है
और दूर कर रहा है
इन्सान को इन्सान से
कही वो ! खुदा तो नही ।

कौन है वो
जिसके इशारे पर
सब कुछ
होने को मजबूर है
कहता है
मैं राम हूँ
अल्लाह,
गोविन्द
और इशू भी
मैं ही हूँ
जो
बहरुपिया बनकर
तुम्हारे पास
आता रहा
मगर
तुम पहचान न सके ।

मजहबी खून - खराबे
को देखकर
शांत है वो
अपने आप को
बंटता देख
मौन हैं वो
खामोश हैं
मज़ारो
और पत्थरो में
कहता है
मुझे
क़ैद कर लिया है
मेरे
चाहने वालो ने ।

धर्म और
जाति के नाम पर

कर दिए है
मेरे टुकड़े - टुकड़े
शर्मसार है वो
अपनी रची कायनात पर
उसकी आंखों में भी
आज आंसू है
तड़प है
उसके मन में भी
मेरी ही तरह
कही वो
खुदा तो नही ।

करवटें

हर बार
कुछ नया दे गयी
मेरी

अनचाही करवट
कभी दर्द
तो कभी दिलासा
कभी उलझन
तो कभी उलाहना भी
दे गयी
मेरी करवट ।

कभी
बेचैन किया मुझको
तो कभी
सुकून बंकर
मेरी आंखों से बहती रही
कभी तरन्नुम
तो कभी तनहाई भी
दे गयी
मेरी करवट ।

आने वाली
ख़ुशी की दिलासा
मुझे दूर से
स्पर्श करती रही
टूटती रही
सपनो की अनवरत श्रंखलायें
कभी मंझधार

तो कभी किनारा भी
दे गयी
मेरी करवट ।

सिर्फ तेरे लिए

तुझको
भूला नही
एक पल के लिए
याद आती है तेरी
आंसू लिए
याद तो करती होगी
तू मुझको कभी
रो भी लेती हों
शायद

तू मेरे लिए ।

आंसू
तेरे है अनमोल
तेरे लिए
बहाना कभी भी ना
मेरे लिए
मैं हूँ कौन
जो रोये
तू मेरे लिए
एक मुसाफिर था
मैं बस
सफ़र के लिए ।

कभी रुकता था
राहों में
तेरे लिए
कभी सजता था
मैं सिर्फ
तेरे लिए
आज वो रुकना - सजना
गया है गुजर
याद आता तो
सिर्फ तेरे लिए ।

तू अपना ले
मुझको
नही चाहूँगा
सिर्फ चाहत की

तुझसे
रजा चाहूँगा
तेरी चाहत लिए
यूं ही
गुम जाऊंगा
एक मंजर हूँ
वक़्त आने पर
ढल जाऊंगा ।

बनके दीपक
मैं जलता रह
उम्र भर
खुद के दिल में
हमेशा

अँधेरा किये
रौशनी की
ललक में
मैं फिरता रह
सिर्फ पाने की
तुझको
हसरत लिए ।

मैं भी
बुझ सा गया
ना मैं फिर जल सका
किसी बाटी का
मुझको
ना सहारा मिला
फिर से जलने को
तैयार
तेरे लिए
तू जो कह दे
कि तू
सिर्फ मेरे लिए ।

गीत बन बांसुरी

गीत
बन बांसुरी
तेरे अधरो तलक
मेरे
अधरो की
प्यासी व्यथा गाएंगे
तन से
तन का मिलन
मैंने चाहा नही

मन से
मन का मिलन
फिर से दोहरायेंगे ।

फक्र करना
हमेशा
उजालो पे तुम
हम अंधेरो को
तुमसे
चुरा लायेंगे
सात फेरे तो

सम्भव नही हों सके
मीत तुझ संग
मेरे गीत
बन जायेंगे ।


कर्ज़ अम्बेर का
हम पर
भले ही रहे
मांग तेरी
सितारो से

भर जायेंगे
रोक लेना मुझे
ऐसे नाज़ुक समय
चांद को भी
सितारों संग
ले आयेंगे ।

श्रंखलायें प्रणय की
पावन ढहने लगे
स्मृतियों की लड़ियां
लगा जायेंगे

रात भर दूसरो की
व्यथाएं सुनी
रागिनी
कल सुबह की
सुना जायेंगे ।

गीत बन बांसुरी तेरे अधरों तलक
मेरे अधरो की प्यासी व्यथा गायेंगे .......

बात जुबां पर कैसे आये?

मेघा छाये
बरखा लाए
सावन बीता जाये

प्रियतम आये
दिल घबराए
बात जुबां पर कैसे आये ?

दूर से वो
ताके है यूं
जैसे
सब कह देगा हाय !
हाय ! दिल ये
मचले फिर भी
बात जुबां पर कैसे आये ?

कुछ वो सहमें
कुछ मैं सहमूं
आंखों से

आँखें बतलाएं
होंठों तक है

प्यास भरी पर
बात जुबां पर कैसे आये ?

मर्यादा की
दहलीज़ पर
दो दिल
देखो कैसे शरमायें ?
बाहें चाहे
तुमको भर ले
बाँहों को
कैसे समझायें ?

कहने को तो
प्यार नही है
बंशी फिर
क्यूं है हरजाई ?
कान्हा को
घेरे जब गोपी
राधा का
मन जल - जल जाये ?

मन ने चाहा
तुमको माना
जीवन साथी

बनकर आना
सात फेरे
संग तेरे
हाय !
सपने क्यूं तरसाये ?

Saturday, March 24, 2007

तुम्हारा अविश्वसनीय प्रेम

अग्नि के सात फेरे
और
चुटकी भर सिन्दूर
दूर कर देगा
मुझे
तुम्हारे पास से
लेकिन !
क्या वे अनगिनत फेरे
जो
भावनाओ की दहलीज़ पर
हमने
साथ साथ लगाए
वे सब
शून्य हों जायेंगे ।

एक अजनबी के
तन का स्पर्श
और
मात्र रिवाजो की झूठी डोर
तुम्हे मेरे
मन के असंख्य स्पर्शो
और
जन्मों के बन्धन से
दूर ले जायेगी
लेकिन !
क्या नियति के आगे
घुटने टेक देगा
मेरा विश्वास ?
जो मुझे तुमसे मिल था ।

किसी का झूठा विश्वास
पाने की खातिर
झुठला दी जाएँगी
वे सभी
संकल्पित सौगंधे
टूट जाएगा विश्वास
और छिन्न - भिन्न हों जायेगी
मेरी तुमसे
सारी अभिन्नातायें
सिर्फ
मान्यताओं को निभाने की खातिर ।

जीत होगी भाग्य की
और
मेरा निश्चय हार जाएगा
टूट जाएगा भ्रम मेरा
मेरा विश्वास डोल जाएगा

स्वप्न बौने हों जायेंगे
वास्तविकता के धरातल पर
रह जायेगी
तो सिर्फ प्रतीक्षा
तुम्हारे वापस आने की ।

मंगलसूत्र के चांद मोती
खंडित कर देंगे
हमारे प्रेम सूत्र को
सुहाग रात की सेज रौंद डालेगी
हमारे बीच के विश्वास को
मंडप की वेदी
हिला देगी
प्रेम का निश्चय स्तम्भ
मगर फिर भी
महकता रहेगा मेरे अन्तस में
तुम्हारा अविश्वसनीय प्रेम ।

सफल होगी आराधना

विश्वास है
अन्तस में मेरे
और मन में
आस है
देर से होगी
मगर
होगी सफल आराधना ।

कब तलक
तपती रहेगी
यूं मेरी
ये साधना
देर से होगी
मगर
होगी सफल आराधना ।

ए सहज
तुझको निमंत्रण
है क्षितिज के पार से
देवता भी
कर रहे हैं
तेरे पथ की सराहना ।


कह रही है
माँ मेरी भी
मुझसे
ओ मेरे लालना !
देर से होगी
मगर
होगी सफल आराधना ।

साथ मेरे
चल रही है
मन की
निश्छल भावना
फिर भला कैसे
ना पूरी
होगी ये आराधना ।

मैं दुःखी नयनों को
सच्ची
दे सका जो सांत्वना

तो समझ लूँगा
सफल है

ये मेरी आराधना ।






आँखें तेरी

सागर का
किनारा लगती है

जीने का
सहारा लगती है
ये आँखें तेरी
या मंदिर हैं
पावन सा ठिकाना लगती है ।

हंसती आंखों में
तनहाई
तनहा आंखों में
याद कोई
आती है जब भी
पास मेरे
खोयी - खोयी सी लगती है ।

आंखों की
चौखट पर तेरी
देखा जो
आंसू का डेरा
कोई कुछ भी कहे
पर मुझको तो
ये भीगा सावन लगती है ।

आंसू की
नन्ही बूंदो को
धीरे से छुपाया पलकों में

कोई देख ना ले
पर मुझको तो

ये बातें पुरानी लगती हैं ।

पूजा की
थाली लगती है

अमृत की
प्याली लगती है
ये आँखें तेरी
या रामायण
पढने में अच्छी लगती है ।

आंखों की
बूंदो से अक्सर
करती है जो
अभिषेक मेरा
शायद वो
मेरी कविता है
पुरी होने से डरती हैं ।

जीवित कर दो मेरी साँसों को

ये रंग नही
ये जीवन है
साँसे है
जीवन जीने की
मुझमे भी
भरकर रंग कोई
जीवित कर दो मेरी साँसों को ।

कई आयी बहारें
चली गयी
सूखी है पड़ी
जीवन क्यारी

मुझमे भरकर सावन कोई
जीवित कर दो मेरी साँसों को ।

फूलों सा खिला
जीवन चाहा

काँटों से घिरा
जीवन पाया
बनकर
मधुवन की कोई कली
तुम महका दो इस जीवन को ।


नयनों ने मेरे
आंसू के सिवा
क्या और दिया
इस राही को
जिससे चाही खुशियाँ मैंने
उसने भी दिए आंसू मुझको ।

मैंने जिसको
पूजा माना
तूने
समझा क्यूं पाप उसे

करके
सुंदर अभिषेक तुम्ही
पावन कर दो इक मूरत को ।

कोई मेरा कभी तो
हों ना सका
मैं साबका हुआ
इस जीवन में
मुझको अपना कर जीवन में
जीवित कर दो मेरी साँसों को ।


मत करना अफ़सोस मेरा

रोली और चन्दन
माथे पर

रचकर करना अभिषेक मेरा
मैं जाऊं
जग ये छोड़ कभी
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।

गंगा जल से तुम
नहला कर
करना पावन ये शरीर मेरा
मैं जाऊं
जग ये छोड़ कभी
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।

माथे पर
भू की धूल लगा
कर देना तुम श्रंगार मेरा
आ जाये
मेरी याद कभी
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।

श्रध्दा के फूल
चढा देना
ना करना तुम
विश्वास मेरा
हों सकता है मैं
ना लौटूं
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।


जाने वालो पर
चला नही
क्या ज़ोर तेरा ? क्या ज़ोर मेरा ?
मैं जाऊं
जब सब छोड़ कभी
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।

कागज़ के पृष्ठों पर
ये अक्षर
कर जाएँ जब नाम मेरा
तुम भी
प्यारी कविता रचकर
पूरा करना ये काम मेरा ।

आंखों का काजल
गालों पर लाकर
अपमानित मत करना
कोई चोट लगाए
मन को कभी
तो हंसकर दुःख
कम कर लेना ।

ये मर्म सुरों का
समझ ना पाया
जीते जी संसार तेरा
सुर तेरे
जब दोहराये सभी
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।

जिन गीतों में थे
प्राण बसें
उनसे अब मेरा क्या नाता ?
कोई गीत मेरा
याद आये कभी
तो मत करना अफ़सोस मेरा ।

हम अकेले

हैं अमिट ये पांव मेरे
चल रहे है
जो तिमिर में
चिह्न उभरेंगे तभी
जब आंख खोलेंगे सवेरे ।

साथ मेरा ना किसी से
जग ये छोडेंगे
अकेले
चल बसें एक रोज़
हम जो
जन्म फिर लेंगे अकेले ।

भूलकर भी भूलना मत
खोजना तुम
गीत मेरे
हों सके तो छोड़ देना
जिस कुपथ पर पाँव तेरे ।

लौटकर आया ना बचपन
जो गया था
दूर मेले
अब जवानी कट रही हैं
ढुंढ्ने में वो ही मेले ।

हम अकेले तुम अकेले
आये हैं
हम सब अकेले
राह किसकी देखता है
जाएगा तू भी अकेले ।

साथ मेरे ना सही वे
जो कभी थे
मेरे अपने
नाम कर जाएगा ये
अभिषेक अपना ही अकेले ।

ना किसी को थी खबर
जब अश्रुओं से
पृष्ठ भीगे
लेखनी चलती रही थी
दर्द बाहों में समेटे ।

आ खड़ा हूँ मैं समर में
शांति का
परचम लपेटे
देखता हूँ कब तलक
लड़ता रहूंगा मैं अकेले ।

जीवन

ये कोरे कागजों पर
सच के कुछ
अल्फाजों को
है लिख रह जीवन
मेरी
तनहाई को
आंखों में भरकर रो रह जीवन ।

यूं नंगे पाँव फिर
शोलों पर
है क्यों चल रह ?
जीवन !
किसी की
राह ताकते
क्यों नही हैं थक रह जीवन ?

इन सूखी डालियों को
आज भी
लगता है अक्सर क्यों ?
कोई
सावन है
लेकर आ रहा इनका नया जीवन ।

ये मंज़िल को भी
लगता है
वो आएगा कभी
उस तक
मगर
अफ़सोस इतना है
कहीं मिट ना जाये जीवन ।

परिणय

कल्पना के पंख ओढे
आ गयी
ऋतु अब मिलन की
भावना ले
मंडपो में
दूरियाँ बस कुछ पलों की ।

प्रेम को परिणय
मिला है
नयनों को दर्पण
मिला है
अब नही
बनवास बाक़ी
दूरियाँ बस कुछ पलों की ।

जन्मों की डोर

कांटो पर चलते - चलते
फिर फूल खिलेंगे
अंधियारे ढोते - ढोते
उजियारे
बोल पड़ेंगे ।

दर्द की आहट का
अब तो
एहसास ख़त्म है

सब्र का पल्लू छोड़
ख़ुशी के गीत लिखेंगे ।

तनहाई भी टूटेगी
थोड़ी दूर जो
साथ चलेंगे
खामोशी सहते - सहते
सन्नाटे

बोल पड़ेंगे ।

प्रिय मेरा और तेरा नाता
हरदम रहा
पहेली जैसा

संशय के बन्धन टूटेंगे
हम जन्मों की डोर लिखेंगे ।



नव वर्ष

है खड़ा नव वर्ष
द्वारे
ले सुखो के
स्वप्न सार
रात्रि ने तम वस्त्र त्यागे
रवि रश्मि ने
नव वस्त्र धारे।

रश्मियों के ये
उजाले
लग रहे है आज
न्यारे
दे रहे संदेश
जग को
कोयलों के गीत प्यारे ।

मैं जिया इस वर्ष
जो भी
सुख के पल

और दुःख की रातें
स्म्रतियाँ
बनकर रह गयी
वे
भूली - बिसरी सारी बातें ।

बस यही वर
चाहता हूँ
ब्रह्म
इस पावन समय पर
सुर मेरे जो
मुख से फूटे
गीतों की गरिमा बढ़ाये ।


तन्हाई

शमां जलती रही मैं पिघलता रह ।
वो नही आया उसका ख्याल आया है ॥

मेरी तन्हाई रह - रहकर बढती गयी ।
उसके ख्वाबों में अब कोई और आया है ॥

उसको देखा तो मुझको भी ऐसा लगा ।
जिंदगी में नया एक मोड़ आया है ॥

जाना मुमकिन नही था वो बहुत दूर था ।
आज चलकर वो खुद मेरे पास आया है ॥

रिश्ता

देर तक रात मेरे साथ जागा करती है ।
उसकी पलकों का मेरी पलकों से रिश्ता कैसा ॥

मुझको तनहाई में आकर जो रुला जता है ।
हाय ! ये उनके दुपट्टे का लाल रंग कैसा ॥

मैं मनाता ही रहा बात बिगड़ती ही गयी ।
प्यार था मुझसे अगर तो ये झगड़ना कैसा ॥

जख्म भर जायेंगे मुझको तो फिक्र उनकी है ।
उनके हाथो कि खरोचों का हाल है कैसा ॥

मुझको पीने का नही शौक़ है मगर शाकी ।
पीने के बाद सरेशाम संभलना कैसा ॥

चाहत

सुर सजाकर
प्रेम के
मैं
गीत गाना चाहता हूँ
प्यार को धरती पर लाकर
मैं बसाना चाहता हूँ।

कौन रोता है
यहाँ
खातिर किसी की

ए सहज
मैं
ख़ुशी बनकर
दुःखी आंखों से

बहना चाहता हूँ।

छूट जाते हैं
कई मंजर
किनारो पर खडे
मैं
तेरा मंझदार
में भी

साथ पाना चाहता हूँ।

खो गए जो गीत
मेरे
जा अंधेरो में
कहीं
मैं
उजालों में उन्हें

फिर से बुलाना चाहता हूँ।

कौन कहता है
कि मुझमे
आग
अब बाक़ी नही

मैं
मशालों को यहाँ
फिर से जलाना चाहता हूँ।




Saturday, March 17, 2007

इबादत

मोहब्बत के
इस नए फलसफे का
हमे
इल्म ना था
हम जिसे
इबादत
समझते रहे
वो
उनका पेशा था ।

दुआ

खुशियों के साथ खेले
तारों सी
जगमगाये
बस ये दुआ है
दिल की
दुनिया में नाम पायें ।

यूं तू सफ़र हैं लम्बा
काँटों की हैं
डगर भी
तू सबसे आगे
जाये
फूलों का साथ पाए ।

खुशियाँ बने हक़ीकत
दुःख दूर तुझसे
जाये
सुख का हर एक
लम्हा
तेरे करीब आये ।

गरिमामयी सफ़र हों
तेरी
लगन सफल हों
कष्टो से दूर
सुन्दर
स्वर्णिम शिखर ही घर हों ।


मैंने दुखो को
चूमा
सुख तेरा
सहज वर हों
तू चलना
उसी पथ पर
घर जीत का जिधर हों ।

सत्य

हर जीवन के
अलग
रंग हैं
सबकी अलग कहानी हैं
कहीं बुढ़ापा
मौन
खड़ा हैं

विचलित कही जवानी हैं ।

प्रतीक्षा

अनुपम सी छवि
ईश्वर ने
रची
पाने की जिसे
सबकी इच्छा
मैं भी
प्यासा था
तेरा
कभी
करता हूँ आज भी
प्रतीक्षा

प्रेम

मैंने जब प्रेम किया
तुझसे
साक्षी तब
मेरा बचपन था
सच्ची कोमलता में
रचा बसा
वह शान्त हृदय पावन मन था

वे स्वप्न सुखद
संयोग सुखद
तेरे - मेरे
वे वियोग सुखद
सीमाओं में था रहकर भी
वह अंतर्मन का प्रेम सुखद ।

आकांक्षाओ का मंथन कर
विष मैंने
सारा पी डाला
संसार करे
इच्छा जिसकी
वह अमृत तुझको दे डाला ।

परिणय ही प्रेम नही होता
मिलना भी
प्रेम नही होता
जिसकी
अनुभूति हों अंतर्मन
वह प्रेम विलुप्त नही होता ।

नींव का पत्थर

मैं तो
नींव का पत्थर हूँ
मुझे
दिखने का
शौक़ नही

इमारतें
मुझ पर हैं

मैं
इमारतों पर नही